अगर पांडवों की माता कुंती ने यह भूल नहीं की होती, तो कदाचित महाभारत का युद्ध नहीं होता
महाभारत के महाविनाशक युद्ध के लिए किसी एक पात्र को जिम्मेदार नहीं कहा जा सकता। महाभारत सभी प्रमुख पात्रों के द्वारा जीवन में कोई न कोई ऐसा गलत निर्णय लिया गया; जिसके कारण महाभारत का महाविनाशक युद्ध हुआ।
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आज हम महाभारत के प्रमुख स्त्री पात्र कुंती के द्वारा की गयी भूल के विषय में बात करेंगे। कुंती को बाल्यकाल में ही महाराज कुन्तिभोज ने गोद ले लिया था। महाराज कुन्तिभोज को कुंती पर बहुत स्नेह था। वह उसे अपने कुल का गौरव मानते थे। एक बार महर्षि दुर्वासा कुन्तिभोज के घर पधारे; उस समय महाराज की आज्ञा से कुंती ने दुर्वासा ऋषि की बहुत सेवा की थी; इस कारण से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने कुंती को एक मंत्र दिया जिसके द्वारा वह देवताओं को अपने पास बुला सकती थी।
इसके बाद ऋषि दुर्वासा वहां से चले गए परंतु कुंती मन ही मन सोचने लगी कि क्या ऋषि दुर्वासा का कहा सत्य है; उन्होंने जो मंत्र दिया है वह सत्य है। इस तरह वह ऋषि दुर्वासा के वरदान पर संदेह करने लगी। ऋषि दुर्वासा जो 'शंकर' के अवतार थे; उनके उपर संदेह करना; वह कुंती के जीवन की सबसे बड़ी भूल थी।
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ऋषि दुर्वासा के वरदान की परीक्षा करने के लिए कुंती ने भगवान सूर्य का आह्वान किया और भगवान सूर्य देवीय स्वरूप धारण करके कुंती के सामने प्रकट हो गए। उन्हें देखकर कुंती भयभीत हो गई। कुंती ने सूर्यदेव से क्षमा मांगते हुए कहा कि मैंने केवल दुर्वासा ऋषि के वरदान की परीक्षा लेने के लिए आप का आह्वान किया था; कृप्या आप यहाँ से चले जाइए।
उस समय भगवान् सूर्य ने कुंती से कहा " देवी आप ने मुझे यहाँ पर बुलाया है और ऋषि दुर्वासा के वरदान के कारण मैं आप को पुत्र प्रदान करने के लिए विवश हूँ। मैं अगर ऐसा नहीं करता तो; दुर्वासा मुझे श्राप देकर भस्म कर देंगे। "
इसके बाद सूर्यदेव ने कुंती से कहा मेरे अंश से तुम्हे एक पुत्र उत्पन्न होगा; जो जन्म से ही कवच और कुंडल धारण किये हुए होगा। तुम चिंता न करो क्योंकि मेरे प्रभाव से तुम पुत्र जन्म के बाद भी कुंवारी ही रहोगी।
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इसके कुछ समय बाद कुंती ने एक पुत्र को जन्म दिया; जिसके मुख पर सूर्य का तेज था और शरीर पर कवच और कुंडल था। उस समय कुंती का विवाह नहीं हुआ था; उसे लगा कि समाज को अगर उसके इस पुत्र के विषय में ज्ञात हो गया; तो समाज उसके चरित्र पर लांछन लगाएगा; उसके पिता कुन्तिभोज किसी के सामने अपना सिर उठा नहीं सकेंगे।
इसलिए कुंती ने अपने नवजात शिशु को गंगा के पानी में बहा दिया। सूर्य के उस महान अंश ने जन्म लेते ही अपनी माता को दान दिया और आगे चलकर वह 'दानवीर कर्ण' कहलाया।
इस तरह अपने पुत्र कर्ण को पानी में कुंती ने बहा दिया परंतु उसके बाद कुंती कभी स्वयं को क्षमा नहीं कर पायी। जब कर्ण बड़ा हुआ और पहली बार कुंती के सामने आया; तब उसके कवच और कुंडल से कुंती यह जान ही गयी कि वह उसका पुत्र है परंतु तब भी कुंती यह कह न सकी कि कर्ण उसका ज्येष्ठ पुत्र है।
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कुंती की यह चुपकी भाई भाई के बीच युद्ध का कारण बनी, कुंतीपुत्र अर्जुन और कर्ण दोनों एक दुसरें से द्वेष करते रहे, कर्ण स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के लिए दुर्योधन का मित्र बन गया। भीम के द्वारा भी कई बार कर्ण को कटुवचन कहे गए। द्रौपदी वस्त्रहरण के समय कर्ण ने द्रौपदी का अपमान किया। यह कुछ भी नहीं हुआ होता; अगर कुंती ने पहले ही कर्ण की सच्चाई दुनिया को बता दी होती।
कुंती ने कर्ण की वास्तविकता जब युधिष्ठिर को बताई तब बहुत विलंब हो चुका था। महाभारत का विनाशक युद्ध चल रहा था। कर्ण की मृत्यु हो चुकी थी और साथ ही साथ भीष्म, द्रोण, अभिमन्यु और ऐसे अनगिनत योद्धा अपना रक्त बहा चुके थे। जब युधिष्ठिर को ज्ञात हुआ; तो उसने भी अपनी माता कुंती को इस रक्तपात का दोषी माना और कुंती को श्राप देते हुए कहा " में पापी हूँ; मुझे यह रहस्य ज्ञात नहीं था की कर्ण मेरा भाई है। इसलिए मैंने उसे मरवा दिया। में श्राप देता हूँ कि आज के बाद कोई भी स्त्री अपने मन को रहस्य को छिपा नहीं सकेगी। "
कहानी का सार :- सत्य चाहे कितना भी कड़वा हो; समय रहते उस सत्य का स्वीकार कर लेना चाहिए। जो लोग सत्य का स्वीकार नहीं करते; वह कभी खुश नहीं रह सकते।




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