जानिए रामायण में कहाँ पर हुई है कृष्णावतार की भविष्यवाणी
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हिन्दू शास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग के राम और द्वापरयुग के श्रीकृष्ण के मध्य लगभग सोलह लाख वर्ष का समय है. उसके बाद भी जब हम रामायण पढ़ते है तो कुछ स्थानों पर भगवान श्रीकृष्ण के विषय में पहले ही भविष्यवाणी कर दी गई है.
यहाँ की गई है रामायण में श्रीकृष्ण के विषय में भविष्यवाणी
(१) जब भगवान राम को समुद्र पार करना था तो सबने मिलकर सेतुसमुद्रम का निर्माण कार्य शुरू कर दिया, इस कार्य के लिए हनुमानुजी एक पर्वत को अपने स्थान से उठा दिया और समुद्र की तरफ जाने लगे, मार्ग में उन्हें यह ज्ञात हुआ कि समुद्र पर सेतु का कार्य पूर्ण हो गया है.
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इसलिए फिर हनुमानजी ने उस पर्वत को उस स्थान पर स्थित कर दिया जिस स्थान पर हनुमानजी उस समय थे, तब वह पर्वत उदास हो गया और हनुमानजी से कहने लगा कि आप ने मुझे क्यों भूमि पर रख दिया, मैं राम के काम नहीं आ सका, अब तो मेरा जीवन ही व्यर्थ है.
इस बात पर हनुमानजी ने उस पर्वत को आश्वासन देते हुए कहा कि तुम उदास न हो, जब द्वापर में श्रीराम फिर से श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लेंगे तब वह स्वयं ही तुम्हे धारण करेंगे और उसके बाद तुम्हारी गिनती देवताओं में की जायेगी. दोस्तों वह पर्वत ही गोर्वधन पर्वत था जिसे श्रीकृष्ण ने इंद्र का अहंकार नष्ट करने के लिए धारण किया था.
(२) रामायण में कृष्णावतार की दुसरी भविष्यवाणी स्वयं श्रीराम ने की हुई है, जब भगवान राम ने अपने जीवन का कार्य पूर्ण कर लिया तो वह अपने लोक जाने लगे, तब उनके पीछे पीछे सुग्रीव, हनुमान और जाम्बवन्त भी जाने लगे, उस समय भगवान राम ने सुग्रीव को तो अपने पास आने दिया परंतु जाम्बवन्त और हनुमानजी को वहां पर रोक दिया.
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भगवान राम ने जाम्बवन्त से कहा अब हमारी भेंट द्वापर में होगी जब मैं कृष्णावतार धारण करूँगा तब तक तुम्हे पृथ्वी पर रहना होगा और फिर श्रीराम ने हनुमानजी को कहा कि तुम उस समय तक पृथ्वी पर रहोंगे जब तक पृथ्वी पर लोग मेरा नाम लेते रहेंगे, तब तक तुम्हे पृथ्वी पर मेरे भक्तों की सहायता करनी होगी.
श्री हनुमानजी आज भी पृथ्वी पर शरीर धारण किये हुए है और राम भक्तो की किसी न किसी रूप में सहायता करते है. दोस्तों यह थी कृष्णावतार के बारे में वह दो भविष्यवाणी जिसे रामायण में पहले से ही कर दिया गया था.



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