भारत-नेपाल विवाद: रॉ प्रमुख और नेपाल के पीएम ओली के बीच हुई मुलाक़ात की सत्तारुढ़ सीपीएन को भनक तक नहीं

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 नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी सीपीएन के प्रवक्ता नारायण काजी श्रेष्ठ ने एक बयान में कहा है कि पार्टी को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के प्रमुख सामंत गोयल के बीच बुधवार को हुई मुलाक़ात के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.

ओली सीपीएन के दो चेयरमैन में से एक हैं.

उनके मुताबिक़, सीपीएन के एक और चेयरमैन पुष्पकमल दाहाल प्रचंड या पार्टी के किसी और वरिष्ठ नेता या नौ सदस्यों वाले पार्टी सचिवालय ने इस पर ना कोई चर्चा की है और ना ही किसी को इसकी जानकारी है.

नेपाल के विदेश मंत्रालय की ओर से भी जारी एक बयान में कहा गया है कि उन्हें भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के प्रमुख सामंत गोयल की यात्रा के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. लेकिन नेपाल के प्रधानमंत्री ओली के प्रेस सलाहकार ने गुरुवार को एक बयान में इस बात की पुष्टि की है कि गोयल की ओली से मुलाक़ात हुई है.

आलोचना और संदेह

नेपाल के प्रधानमंत्री ओली के प्रेस सलाहकार सूर्य थापा के सोशल मीडिया पर इस बयान को जारी करने के बाद सीपीएन के नेताओं, कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री की तीखी आलोचना की है.

कई लोगों का कहना है कि प्रधानमंत्री ने कूटनीतिक आचार संहिता का पालन नहीं किया है.

पूर्व विदेश मंत्री और पार्टी के मौजूदा प्रवक्ता नारायण काजी श्रेष्ठ ने कहा कि वह आमतौर पर विदेशी राजनयिकों या राजनेताओं के साथ मिलते रहे हैं लेकिन मुलाक़ात के दौरान विदेश मंत्रालय के एक औपचारिक प्रतिनिधि ज़रूर होते थे.

उन्होंने कहा कि वो सिर्फ़ इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि कोड ऑफ़ कंडक्ट का पालन होना चाहिए.

श्रेष्ठ ने इस बैठक को 'असामान्य' बताते हुए कहा, "यह बहुत स्वाभाविक है कि इस बात को गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री ने इस तरह से भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रमुख से क्यों मुलाक़ात की. सवाल यह उठता है कि यह मुलाक़ात क्यों हुई और उससे भी महत्वपूर्ण है कि इस तरह से क्यों हुई?"

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "यह ऐसी परिस्थिति नहीं है जिसे हल्के में लिया जाए. इस पर चर्चा होगी और होनी भी चाहिए "

गुप्त बैठक

नेपाल ने मई महीने में एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया था उसके बाद से भारत के किसी आला अधिकारी की यह पहली नेपाल यात्रा है.

विश्लेषकों का कहना है कि जब भारत और नेपाल के बीच संबंध सामान्य नहीं हैं, ऐसे समय में भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रमुख का नेपाल आना और प्रधानमंत्री से मिलना, इसके बहुत गहरे अर्थ हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि इस गुप्त वार्ता से, जिसके बारे में नेपाल के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों तक को जानकारी नहीं थी, सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं को गहरा झटका लगा है.

बैठक में क्या कुछ हुआ

नेपाल के प्रधानमंत्री ओली के प्रेस सलाहकार सूर्या थापा ने बयान जारी कर कहा है कि बुधवार को भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रमुख गोयल ने बुधवार को प्रधानमंत्री ओली से शिष्टाचार के तहत भेंट की.

उन्होंने अपने बयान में कहा, "बैठक के दौरान, रॉ प्रमुख ने भारत-नेपाल के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने, बातचीत के माध्यम से मुद्दों को सुलझाने और आपसी सहयोग को बढ़ाने जैसे मुद्दों पर भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया."

आधिकारिक बयान सार्वजनिक होने से पहले नेपाल के किसी भी सरकारी संस्थान ने इस संबंध में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी.

लेकिन कई नेताओं ने यह स्पष्ट किया है कि वे गोयल से नहीं मिले थे.

असंतोष का कारण

सत्तारूढ़ सीपीएन हाल ही में इस बात के लिए तैयार हो गई थी कि वो भारत के साथ विवाद के समाधान के लिए सरकार क्या फ़ैसला करेगी, इस पर विचार विमर्श करेगी.

यह फ़ैसला ऐसे समय में किया गया था जब कई अहम मुद्दों पर सरकार के रवैये को लेकर पार्टी के भीतर भारी मतभेद हैं.

लेकिन बिना किसी की जानकारी के विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रमुख के साथ प्रधानमंत्री की मुलाक़ात से पार्टी नेताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है.

जैसे ही गोयल के नेपाल पहुँचने की ख़बर सार्वजनिक हुई, पुष्पकमल दाहाल (प्रचंड), वरिष्ठ नेता माधव कुमार नेपाल, और प्रमुख विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर द्यूबा ने स्पष्ट किया कि भारत के रॉ प्रमुख से उनकी मुलाक़ात नहीं हुई है.

सीपीएन के स्थायी समिति के सदस्य और पूर्व उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भीम रावल ने गुरुवार को एक ट्वीट करके अपना असंतोष भी ज़ाहिर किया.

उन्होंने कहा कि रॉ के प्रमुख से प्रधानमंत्री ओली की मुलाक़ात के समय पर सवाल उठाया और कहा कि मुलाक़ात का यह तरीक़ा भी आपत्तिजनक था.

कूटनीतिक गरिमा का मुद्दा क्यों

विदेशी मामलों के जानकार भी मानते हैं कि ओली की यह मुलाक़ात कूटनीतिक गरिमा के ख़िलाफ़ थी.

पूर्व राजदूत दिनेश भट्टाराई ने कहा कि हाल में नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव ने भारत की चिंता बढ़ा दी है और रॉ प्रमुख की इस यात्रा के ज़रिए नेपाल हालांकि भारत के साथ बातचीत का दरवाज़ा खोलना चाहता है, लेकिन लंबे समय में इस यात्रा का नेपाल पर बहुत असर पड़ेगा.

उनका कहना था, "जिस तरह से यह मुलाक़ात हुई, इस बात की भी आशंका है कि प्रधानमंत्री ने अपनी निजी परेशानियों का भी ज़िक्र किया होगा और भारत ने उन्हें मदद का आश्वासन भी दिया होगा. इस बारे में भी कोई बातचीत ज़रूर हुई होगी."

उन्होंने आगे कहा, "अगर ऐसा हुआ है तो हो सकता है कि फ़िलहाल इससे कोई फ़ायदा हो, लेकिन लंबे समय में यह कोई मुद्दा बन सकता है."

हालांकि पूर्व विदेश मंत्री रमेश नाथ पांडेय का कहना है कि कूटनीति की कोई सीमा नहीं होती है और हालिया दौरे (रॉ प्रमुख के दौरे) को उसके नतीजों के आधार पर उसका आकलन किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि नेपाल और भारत का इतिहास रहा है कि सैन्य अधिकारियों के ज़रिए राजनियक मसले हल किए गए हैं. वो कहते हैं, "अगर दोनों देशों के बीच ग़लतफ़हमी और संवाद की कमी को दूर करने के लिए कोई कोशिश की गई है तो इसका निर्णय इस बात पर किया जाना चाहिए कि इस कोशिश का क्या नतीजा निकला."

लेकिन दिनेश भट्टाराई के अनुसार कूटनीति में हर चीज़ को सार्वजनिक नहीं किया जाता है और उनके अनुसार यह मामला दूसरी कैटगरी में आता है.

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